नई दिल्ली। देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में करीब तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। पहली नजर में यह बढ़ोतरी सिर्फ वाहन चलाने वालों के लिए परेशानी लग सकती है, लेकिन अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में इसका सीधा असर हर घर की रसोई, मासिक बजट और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक ईंधन की कीमतें बढ़ने का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट पर पड़ता है। भारत में अधिकांश वस्तुओं की ढुलाई सड़क मार्ग से होती है और इसमें डीजल सबसे अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में जैसे ही डीजल महंगा होता है, माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है और कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च का बोझ धीरे-धीरे ग्राहकों पर डाल देती हैं। एफएमसीजी सेक्टर की कई बड़ी कंपनियों ने पहले ही लागत बढ़ने को लेकर चिंता जताई है।
दूध और उससे बने उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका
तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पादों में बिस्कुट, स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, खाद्य तेल, पैकेटबंद खाद्य पदार्थ और पेय उत्पाद शामिल हैं। इन उत्पादों की सप्लाई पूरी तरह मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क पर निर्भर करती है। कंपनियों के कुल ऑपरेशन कॉस्ट का लगभग 6 से 10 प्रतिशत हिस्सा परिवहन और लॉजिस्टिक्स पर खर्च होता है। डीजल की कीमत बढ़ने से यह लागत और बढ़ जाती है, जिसका असर उत्पादों की कीमतों में देखने को मिल सकता है। दूध और उससे बने उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका है। हाल ही में अमूल और मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में करीब दो रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। कंपनियों ने इसके पीछे परिचालन और परिवहन लागत में वृद्धि को प्रमुख कारण बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईंधन महंगा बना रहा तो दही, मक्खन, पनीर, चीज और आइसक्रीम जैसे उत्पाद भी जल्द महंगे हो सकते हैं।
फल-सब्जी, किराने का सामान से लेकर घरेलू इस्तेमाल की वस्तुओं तक होगा व्यापक असर
सब्जियों, फलों और किराने के सामान पर भी इसका असर साफ दिखाई देगा। भारत की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह सड़क परिवहन पर निर्भर है। खेतों से मंडियों तक और मंडियों से बाजारों तक सामान पहुंचाने में भारी मात्रा में डीजल खर्च होता है। डीजल महंगा होने पर ट्रांसपोर्टरों का खर्च बढ़ता है और अंततः इसका बोझ ग्राहकों पर पड़ता है। इसका असर रसोई के बजट पर सीधा पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा। देश के अधिकांश किसान ट्रैक्टर, सिंचाई पंप, कटाई मशीन और परिवहन वाहनों के लिए डीजल पर निर्भर हैं। डीजल की कीमत बढ़ने से खेती की लागत बढ़ जाती है। इसका असर फसल उत्पादन की लागत पर पड़ता है और अंततः खाद्यान्न व कृषि उत्पाद महंगे हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ग्रामीण परिवारों पर इसका असर और अधिक गंभीर हो सकता है। ऑनलाइन डिलीवरी और ई-कॉमर्स सेवाओं की लागत भी बढ़ सकती है। फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म, कूरियर कंपनियां और ऑनलाइन शॉपिंग सेवाएं पूरी तरह परिवहन नेटवर्क पर आधारित हैं। ईंधन महंगा होने से लास्ट माइल डिलीवरी की लागत बढ़ जाती है। इसके चलते कंपनियां डिलीवरी शुल्क बढ़ा सकती हैं, न्यूनतम ऑर्डर राशि बढ़ा सकती हैं या छूट और ऑफर कम कर सकती हैं। घरेलू इस्तेमाल की वस्तुएं जैसे साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, सफाई उत्पाद और पर्सनल केयर आइटम्स भी महंगे हो सकते हैं। एफएमसीजी कंपनियां अक्सर अचानक कीमतें बढ़ाने के बजाय धीरे-धीरे पैकेजिंग या मात्रा में बदलाव कर लागत का असर ग्राहकों तक पहुंचाती हैं। इसलिए आने वाले समय में उपभोक्ताओं को कम मात्रा के पैक या बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है। परिवहन सेवाओं पर भी असर दिखेगा। टैक्सी किराया, बस यात्रा, ऑटो किराया, कूरियर सेवा और खुदरा आपूर्ति श्रृंखला की लागत बढ़ सकती है। इससे आम आदमी के दैनिक खर्चों में इजाफा होगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी रही और घरेलू स्तर पर ईंधन महंगा रहा तो आने वाले महीनों में महंगाई दर पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के मासिक बजट पर सबसे ज्यादा पड़ेगा।

