देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मंत्रिमंडल विस्तार में हरिद्वार के पांच बार के विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक को पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 20 मार्च को शपथ लेने के बाद अब कौशिक के सामने राज्य की पंचायतों को मजबूत बनाने और उन्हें वास्तविक स्वायत्तता प्रदान करने की बड़ी चुनौती है। त्रिवेंद्र सरकार में शहरी विकास मंत्री रह चुके कौशिक को इस बार ग्रामीण क्षेत्रों की जिम्मेदारी मिली है, जबकि कई लोग उम्मीद जता रहे थे कि उन्हें फिर से शहरी विकास मिल सकता है। राज्य गठन के 25 वर्ष बीत जाने के बावजूद पंचायती राज व्यवस्था अभी भी कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है, और नए मंत्री के लिए समय कम है क्योंकि विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए त्वरित कदम उठाने होंगे।
मदन कौशिक के सामने सबसे बड़ी चुनौती 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतों को सौंपे जाने वाले 29 विषयों (विभागों) को वास्तव में हस्तांतरित करना है। राज्य गठन के बाद से अब तक ये विषय पूरी तरह पंचायतों को नहीं सौंपे जा सके, जिसके कारण पंचायतें वित्तीय और प्रशासनिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाई हैं। पूर्व में गठित हाईपावर कमेटी ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान के तहत अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप दी हैं, लेकिन इन पर अमल अभी बाकी है। कौशिक को इन सिफारिशों को लागू कर पंचायतों को सशक्त बनाने की दिशा में तेजी लानी होगी। दूसरी प्रमुख चुनौती पंचायत भवनों की कमी है। प्रदेश की कुल 7817 ग्राम पंचायतों में से 850 से अधिक के पास अपना अलग पंचायत भवन नहीं है। बिना उचित कार्यालय और बैठक स्थल के पंचायतें अपनी जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से नहीं निभा पातीं। मंत्री के सामने सभी पंचायतों में भवन निर्माण कराने का दबाव है, जो बजट और कार्यान्वयन की दृष्टि से जटिल कार्य है। तीसरी चुनौती पलायन से खाली हो चुके गांवों की है। राज्य में एक हजार से अधिक ग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां पलायन के कारण लगभग कोई आबादी नहीं बची है। इन गांवों को पुनर्जीवित कर लोगों को वापस लौटाने के लिए रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और आकर्षक योजनाओं की जरूरत है। कौशिक को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली नीतियां बनाने होंगी ताकि पलायन रुके और गांव फिर से बसें। चौथी समस्या पंचायत भवनों के निर्माण में विलंब है। केंद्र की तर्ज पर राज्य सरकार ने पंचायत घरों के लिए प्रति इकाई धनराशि 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने की घोषणा की थी, लेकिन कैबिनेट से यह प्रस्ताव पास नहीं हो पाया। नतीजतन पिछले दो साल से 50 करोड़ रुपये की राशि खर्च नहीं हो सकी है। नए मंत्री को इस प्रस्ताव को जल्द मंजूरी दिलाकर फंड का उपयोग सुनिश्चित करना होगा। पांचवीं चुनौती शिक्षा विभाग के बंद हो चुके 2200 स्कूलों को पंचायतों में हस्तांतरित करना है। छात्र संख्या शून्य होने के कारण ये स्कूल बंद हो गए हैं और इन्हें पंचायत भवनों के रूप में उपयोग करने का प्रस्ताव पहले आ चुका है, लेकिन अब तक हस्तांतरण नहीं हुआ। इन भवनों का उपयोग कर पंचायतों की समस्या कुछ हद तक हल हो सकती है। पंचायती राज मंत्री मदन कौशिक के पास अनुभव है, लेकिन ग्रामीण उत्तराखंड की इन जटिल समस्याओं से निपटने के लिए उन्हें समन्वय, तेज निर्णय और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। यदि वे इन चुनौतियों पर काबू पा लेते हैं तो राज्य की पंचायतें सशक्त होकर विकास की नई गति पकड़ सकती हैं।