मानसून शुरू होने से पहले चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या पच्चीस लाख पार करने का अनुमान

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उत्तराखंड में विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है। देश-दुनिया से लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा केदार, बदरी विशाल, मां गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए देवभूमि पहुंच रहे हैं। लेकिन इस भारी उत्साह और रिकॉर्ड तोड़ती भीड़ के बीच एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। चारधाम यात्रा मार्गों पर श्रद्धालुओं की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यात्रा शुरू होने के महज 29 दिनों के भीतर ही 55 श्रद्धालुओं की असमय मौत हो चुकी है, जिसने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी दावों के विपरीत बढ़ता यह आंकड़ा अब प्रशासन के लिए सिरदर्द बन चुका है, क्योंकि अभी पूरी यात्रा के पांच महीने शेष हैं और आगे कठिन मानसून सीजन का सामना भी करना है। इस वर्ष चारधाम यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। चारों धामों के कपाट खुलने के बाद से 17 मई तक कुल 15,63,672 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। पर्यटन विशेषज्ञों और प्रशासन का अनुमान है कि उत्तराखंड में मानसून सीजन शुरू होने से पहले तक यह आंकड़ा करीब 25 लाख के पार पहुंच सकता है।

गौरतलब है कि इस बार 19 अप्रैल को गंगोत्री एवं यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ यात्रा का आगाज हुआ था। इसके बाद 22 अप्रैल को बाबा केदारनाथ और 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। कपाट खुलने के शुरुआती दिनों से ही खासकर केदारनाथ और बदरीनाथ में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस दौरान केदारघाटी और बदरीनाथ में मौसम खराब हुआ, कई दौर की बारिश और बर्फबारी हुई, लेकिन बाबा के भक्तों के कदमों को मौसम की ये दुश्वारियां भी नहीं रोक सकीं। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यात्रा मार्ग पर अब तक जिन 55 श्रद्धालुओं की मौत हुई है, उनके पीछे की सबसे मुख्य वजह हृदय गति रुकना (हार्ट अटैक) और अत्यधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी के कारण स्वास्थ्य खराब होना है। आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि पैदल चलने वाले मार्गों में केदारनाथ की चढ़ाई श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील साबित हो रही है। बीते दिन (17 मई) भी केदारनाथ यात्रा मार्ग पर दो श्रद्धालुओं ने दम तोड़ दिया। यात्रा शुरू होने से पहले स्वास्थ्य विभाग ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि इस साल मुस्तैद चिकित्सा व्यवस्था और ओआरएस/ऑक्सीजन बूथों के जरिए मौतों के आंकड़ों में भारी कमी लाई जाएगी। हालांकि, धरातल पर स्थितियां इसके उलट नजर आ रही हैं। महज एक महीने में 55 मौतें होना इस बात का संकेत है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और कड़कड़ाती ठंड को झेलने में मैदानी इलाकों से आने वाले यात्री असमर्थ साबित हो रहे हैं। आने वाले दिनों में चुनौतियां और बढ़ने वाली हैं। उत्तराखंड में मानसून के दौरान भूस्खलन (लैंडस्लाइड), भारी बारिश और अचानक तापमान गिरना आम बात है। पिछले सालों के अनुभव बताते हैं कि मानसून के दौरान स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और अधिक विकराल रूप ले लेती हैं। ऐसे में बचे हुए 5 महीनों की यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराना स्वास्थ्य विभाग के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार इस स्थिति को लेकर पूरी तरह संवेदनशील है। उन्होंने कहा, "हम मौतों के इस बढ़ते ग्राफ को रोकने के लिए हरसंभव कदम उठा रहे हैं। यात्रा शुरू होने से पहले ही विभाग ने विभिन्न भाषाओं में 'हेल्थ एडवाइजरी' (स्वास्थ्य मार्गदर्शिका) जारी की थी ताकि बाहरी राज्यों के लोग अपनी भाषा में गाइडलाइंस समझ सकें।" स्वास्थ्य मंत्री ने श्रद्धालुओं से भी आत्म-जिम्मेदारी की अपील की है। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु पहले से ही हार्ट पेशेंट (हृदय रोगी), हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप), या शुगर (मधुमेह) जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं, वे अपनी सुरक्षा से समझौता न करें। ऐसे यात्री मैदानी इलाकों या ऋषिकेश-हरिद्वार में अपना संपूर्ण स्वास्थ्य परीक्षण करवाने और डॉक्टरों की हरी झंडी मिलने के बाद ही पहाड़ों की कठिन चढ़ाई की शुरुआत करें। बहरहाल, आस्था और सेहत के इस संतुलन को बनाए रखना प्रशासन और जनता दोनों के लिए अनिवार्य हो गया है, ताकि देवभूमि की यह पवित्र यात्रा हादसों की भेंट न चढ़े।